save the nature save the planet
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प्रकृति का संरक्षण
हम कैसे अपनी धरती को संरक्षित कर सकते हैं? यह एक सवाल है कोई नया सवाल तो नहीं पर एक सवाल तो है जिसे लोग भूल रहे हैं। दरअसल हमारी आकांक्षा हमारे जीवन जीने का ऊंचा से ऊंचा दर्जा सबकुछ यहीं रह जाती है अगर कुछ लिपट कर जाता है कफ़न में तो हमारा पंचतत्व का शरीर। एक ऐसी दौर में शामिल होने के लिए संघर्ष का सिलसिला शुरू होता है जिसका लक्ष्य होता है काबिल इंसान बनना और तरक्की का फसल उगाना सिखने लगते हैं। दौलत की मल्लिकाएं को पाने के लिए लोग काबिलियत की पढ़ाई तो कर लेता है डिग्री भी हासिल हो ही जाता है और रह जाता है प्रकृति के आंखों का सपना। जी हां प्रकृति के भी कुछ आकांक्षाएं है पृथ्वी अपनी सुंदरता इसी हरियाली में पाती है साइनसदानो ने प्रकृति को नकारा है।
आप सोच रहे होंगे मैंने ऐसा क्यों कहा?
दरअसल यहां जीवन ख़तरे में डालकर नये तनिको को विकसित करके वैज्ञानिक यह समझते हैं हम जीवन को चांद पर सुरक्षित कर पाएंगे। ज़रा सोचिए क्या आपको नहीं लगता साइंस अपने इशारे पर इस पृथ्वी को इधर से उधर करना चाहती है। तकनिकी जानकारी,विकास और कुछ नयापन लाने की कल्पना गलत तो नहीं ही है परंतु कैसा विकास क्या हम पृथ्वी को बंधक बनाएंगे?
सुर्य को कृत्रिम बना कर, मिट्टी को कंकङ की लेप बना कर पेङ पौधे को काट कर नये नये उपकरणों के इस्तेमाल से क्या हम अपनी बर्बादी स्वयं नहीं तय कर रहे हैं? इस पृथ्वी का असली हकदार वह भी है जो आपके लिए खेतों से फसल उपजाता है। कहीं ना कहीं हम उन्हें नजरंदाज कर रहे हैं जो कि पूर्णतः गलत है। आप अपने एक अंग काट कर कुछ नया मशीन फिट कर के आप जीवन को नयी उङान का नाम नहीं दे सकते हैं। अतः हमें चाहिए कि हम जो करें उसका अल्टीमेटली फायदा इस धरती को हो और अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो यह आने वाले पीढ़ी के लिए घातक साबित होगा। धरती कोई आजकल का नहीं है आप जा कर पढ़िए इतिहास को उस समय के पन्नों पर लिखा है। अनल अक्षरों में लिखा है और भारत का तरकीब में न जाने कितने अनगिनत इतिहास छुपा है। भारत ने यह साबित भी किया है इसलिए आज भी इस धरती को भारत माता कहा जाता है। वेदों में वर्णित एक एक शब्द में पृथ्वी के महत्ता उल्लेखित है इसकी प्रभुत्ता कम ना होने दिया जाए यह हमारे जीवन का आधार है।
नमस्कार, आज आप सबके सामने एक नया आर्टिकल लाया हूं मुझे यकीन है इस पृथ्वी पर जीवन जीने वाले प्रत्येक व्यक्ति इस पर विचार करना चाहेगा।
अधिक से अधिक पेङ लगाने के लिए हमें काम करना चाहिए
हम पानी को बचाने में हर संभव प्रयास करें यह जरुरी है।

अगर पृथ्वी की जीने लायक जीवन देखना चाहते हैं अगले कुछ वर्षों तक तो हमें हरियाली बरतनी होगी।
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हम सभी जानते हैं अधिक से अधिक उपकरणों ने नुकसान पहुंचाया है। निस्संदेह इस बात पर ज़रा सा भी प्रश्नवाचक निगाह नहीं कि ज्यादातर लोग केवल अपनी मुंह मियां मिट्ठू कीया ओ इसतरह हमने केवल नुकसान के सिवा इस धरती को और कुछ नहीं दिया। मैं समझता हूं हमारी आकांक्षा बङी हो हम समस्या के जङ चेतन को समझें और फिर उससे जुड़ी सभी बातों को बिन बुलाए मेहमान के रुप में एक एक कर के डिस्कस होनी चाहिए। हमारे सपनों की उड़ान बिल्कुल ऊंची होनी चाहिए परंतु हमारा झुकाव सदैव और उतना ही प्रकृति के ओर झुका होना होना चाहिए। माफ़ किजिएगा मैं आपको ऐसा इसलिए कैह रहा हूं क्योंकि मुझे लगता है अधिकांश लोग इस बात को बखूबी किताबों के अलावा निजी जिंदगी में कोई सार्थक नहीं समझते। ज़मीनी स्तर की एक छोटी सी हकीकत बताना चाहता हूं आप जा कर टहलिए उस क्षेत्र में और अधिक से अधिक जानकारी हासिल किजिए की वहां का हरियाली कैसा है। आप पाएंगे कि उस क्षेत्र में जहां हरियाली अधिक है उस क्षेत्र में नदी कभी सुखा नहीं होगा वहां के नलका में आज प्रचूर मात्रा में पानी का प्रवाह हो रहा होगा। क्या आपने कभी सोचा है प्रकृति के सन्दर्भ में पिछे होने के कारण शहर के प्रमुख नुकसान क्या क्या है? सच् कैह रहा हूं आपके शहर में पीने के पानी का किल्लत आंदोलन खङा कर रहा और ऐसा भी हो सकता है आने वाले समय में यह आपको भी नंगा नाच करवाएगा। ऐसा मैं इसलिए नहीं कैह रहा हूं कि यह केवल आपके जीवन को छिन्न-भिन्न कर देगा बल्कि यह हमारे जीवन जीने वाली पीढ़ी को तङपा तङपा कर मात देगी क्योंकि हम स्वयं अपनी टांगें काट रहे हैं। शहर में सङक है पर नहर नहीं क्योंकि उस शहर में जो शख्स रहता है वह निहायती कमीज़ से अमीर अक्ल से गुमशुदगी में जीता है। मैंने ऐसे कई शख्स को इन्हीं आंखों से देखे हैं जो अमीरी के पागलपन में इतना तक कैह डालने में नहीं कतराता की मैं तो कोल्डड्रिंक से मुंह धोया करता हूं तुम्हारी औकात पानी पीने तक की नहीं है। किसी भी व्यक्ति विशेष या अमीरों वाले शौख पर उंगली नहीं उठा रहा बस एक सच्चाई के तौर पर इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूं। स्पष्ट करना चाहूंगा इंसानियत के दृष्टिकोण से उस ऊपर वाले के द्वारा बनाये गये मानवीय अदालत में की इंसान को समझना चाहिए वो इंसान है। जब इंसान खाता चावल है, पीता पानी है, ज्ञान अर्जीत करने वाला माध्यम पुस्तक है अतः टेक्नोलॉजी का इस प्रकार मानव जीवन के जीवन को कस्टमाइज़ से अधिक नुकसान पहुंचाता है। आज के शिक्षा व्यवस्था जर्जर हो चुका है आखिर हम ऐसे लचर जीवन जीने लायक पृथ्वी क्यों अगिले पीढ़ी को दान कर रहे हैं। मुझे लगता है उस समय वैदिक सभ्यता इसलिए भी बेहतर होगा क्योंकि उस वक्त शायद जीवन, पृथ्वी, मानवता को बेहतर बनाने वाले गुरु खास हुआ करते होंगे। आज का यह हरियाली उसी वक्त का देन है वे जानते होंगे इसकी महत्ता को अतः उन्होंने उस वक्त पृथ्वी को सेवा करने वाले परोपकार का इसलिए ही बढ़ावा दिये होंगे। क्या आपको लगता है आज हम स्वक्ष हवा साफ जल सही वातावरण में पल बढ़ रहे हैं? मुझे तो लगता है कयी माईने में आप भी इसे गलत ठहराएंगे क्योंकि यह सत्य है आज कल प्रत्येक दिन एक दो बीमारी जन्मता है। आईए हम अपनी इस हरी भरी धरती को और बेहतर और महफूज बनाते हैं इसके लिए हमें निर्णय तो लेना ही पड़ेगा। हमारी नयी पीढ़ी कस्टमाइज़ेशन को अपना एजुकेशन और जिंदगी को एक चैलेंज बना रहे हैं जबकि आज से कुछ समय पहले यह बिल्कुल उल्टा था। उस वक्त हम कस्टमाइज़ होने का सपना देख रहे थे अतः समय के  इस निरंतरता ने जीवन जीने के लहजे को पराकाष्ठा तक पहुंचा डाला।
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हम प्रकृति को सेवा कैसे कर सकते हैं?
अगर हम यह तय कर लें कि हमें अपने अधिकार क्षेत्र की जिम्मेदारी निभानी है अगर हम यह तय कर लें कि हम किसी ना किसी रूप से प्राकृतिक बनें रहेंगे तो यह संभव है। आप दस नहीं तो कम-से-कम एक पेड़ अवश्य लगाएं अगर ऐसा भी नहीं कर सकते तो कम-से-कम कुछ फल अवश्य खरीदें। जब आप फल खाएंगे तो निश्चित रूप से लोग फल की खेती-बाड़ी अधिक करेंगे और फिर इसका बढ़ावा होगा। मेरा मतलब बस इतना है कि आप टेक्नोलॉजी से प्यार करते करते मिट्टी के इस मिश्रीत खुशबू को ना भूलें। धन्यवाद आभार आपका, इस पोस्ट का केवल प्रकृतिवादी के रुप प्रकृति संरक्षण के संदर्भ में लिखा गया है।
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